‘नवा छत्तीसगढ़ के 36 माह‘ : समूह के माध्यम से आर्थिक और सामाजिक रूप से सशक्त हो रही महिलाएं

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मुर्गीपालन व्यवसाय बना औराईकला की महिला समूह के लिए आय का जरिया

 रायपुर। राज्य सरकार विभिन्न योजनाओं के माध्यम से  महिलाओं को सशक्त एवं आत्मनिर्भर बनाने के लिए सतत प्रयास कर रही है। राज्य में पिछले 36 माह में  विभिन्न विभागों एवं शासकीय योजनाओं के माध्यम से महिलाओं को समूह के माध्यम से रोजगार एवं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने की पहल के सार्थक परिणाम सामने आने लगे हैं।

गौठानों से जुड़ी महिला समूह वर्मी कम्पोस्ट उत्पादन के साथ-साथ मुर्गीपालन, बकरीपालन, सब्जी उत्पादन जैसी आयमूलक गतिविधियों को अपनाकर करोड़ों रूपए का कारोबार और लाभांश अर्जित करने लगी है।

छत्तीसगढ़ राज्य के जांजगीर-चाँपा जिले के बलौदा विकासखण्ड के गांव औराईकला की स्व-सहायता समूह की महिलाओं के लिए गौठान में बनाया गया पोल्ट्री शेड उनके लिए कर्मभूमि और आय का जरिया बन गया। समूह की महिलाएं यहां मुर्गीपालन व्यवसाय अपनाकर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने लगी है। इससे उनके परिवार के रहन-सहन और सामाजिक स्थिति में बदलाव आया है।

 ग्राम पंचायत औराईकला के मोहारपारा की जय सती माँ स्व सहायता समूह की महिलाओं ने शुरूआती दिनों में छोटी-छोटी बचत करके जो पैसा जमा किया, उसे कम ब्याज पर जरूरतमंदों को देकर उनकी मदद की। इससे वे गाँव में लोकप्रिय होने लगीं और धीरे-धीरे आर्थिक रुप से मजबूत भी हुई।

कुछ रकम जमा हुई, तो उन्होंने मुर्गीपालन व्यवसाय करने का निर्णय लिया। इसके लिए उन्हें एक बड़े शेड की जरूरत थी। समूह की महिलाओं ने अपनी इस जरूरत को ग्राम पंचायत के माध्यम से ग्राम सभा के समक्ष रखी। ग्राम सभा के अनुमोदन के आधार पर 5 लाख रुपये की लागत से महात्मा गांधी नरेगा अंतर्गत समूह के लिए मुर्गीपालन शेड निर्माण का कार्य मंजूर किया गया।

समूह की अध्यक्ष रूप बाई छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन (बिहान) योजना से अनुदान राशि के रुप में मिले रिवाल्विंग फंड के 15 हजार रूपए एवं सी.आई.एफ. (सामुदायिक निवेश निधि) के 60 हजार रुपए से उनके समूह ने शेड में मुर्गीपालन का काम शुरू किया।

उन्होंने काकरेल प्रजाति के 600 चूजे खरीदे, जिन्हें नियमित आहार, पानी, दवा एवं अन्य सुविधाएं देकर छह सप्ताह में बड़ा किया। मौसम खराब होने के कारण कई चूजों की मौत हो गई, जिससे समूह को काफी नुकसान हुआ। इन सबके बावजूद समूह की महिलाओं ने हार नहीं मानी और अपने आत्मबल और समूह की दृढ़ इच्छाशक्ति के दम पर फिर से मुर्गीपालन के काम में जुट गई।

इस बार समूह ने 600 ब्रायलर चूजे खरीदे और उनकी देखभाल करना शुरू किया। धीरे-धीरे ये चूजे बड़े हो गए। आखिरकार इन महिलाओं की मेहनत रंग लाई और चाँपा के एक बड़े व्यवसायी ने मुर्गों को बेहतर दाम देकर खरीद लिया।

इस बार समूह को मुर्गीपालन से लाभ हुआ और सभी खर्चों को काटकर उन्हें लगभग 30 हजार रूपए की बचत हुई। समूह की सचिव मालती चौहान बताया कि लाभ होने से समूह की सभी सदस्य काफी खुश हैं। समूह ने फिर से लगभग 600 चूजे और खरीद कर पाला। जिसके विक्रय से समूह को लगभग 50 हजार रूपए का मुनाफा हुआ। मुर्गीपालन व्यवसाय से लगातार मुनाफा होने से गांव की अन्य महिलाएं भी इस अपनाने के लिए प्रेरित हुई है। 

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